अप्राप्त लक्ष्मी (धन) कैसे घर लाएं

How to bring Lakshmi (money) at home

आज का युग अर्थ​ प्रधान है । धन​ का महत्व सर्वविदित​ है । बिना धन के किसी का काम चलने वाला नहीं है । जो धनार्जन​​ की दौड़ में पिछड़ गया, वह जेट की गति से भागने वाले इस​ युग में विकास की पंक्ति में अपना स्थान खो बैठा । ‘अर्थो मूलं अनर्थानाम्’ की परिभाषा अपने अर्थ खो चुकी है, बिना लक्ष्मी के किसी का काम चलने वाला नहीं है, इसीलिए नीतिकार ने ठीक ही लिखा है –

लक्ष्मी भूषयते रूपं, लक्ष्मी भूषयते कुलम ।

लक्ष्मी भूषयते विघां सर्वांल्लक्षमी विशिष्यते ।

लक्ष्मी से रूप की शोभा बढ़ती है, लक्ष्मी से कुल की शोभा बढ़ती है और लक्ष्मी से विद्या की शोभा बढ़ती है, इसलिए लक्ष्मी की सर्वत्र​ विशेषता कही गई है । अतः आज के युग में प्रत्येक व्यक्ति को अधिक से अधिक धनार्जन​ करने का प्रयत्न​ करना चाहिए । धन की अनिवार्यता तो यहां तक है कि महाराज भर्तृहरि ने बडे़ ही तीखे शब्दों में लिखा है – 

यस्यार्थाः तस्य मित्राणि यस्यार्थाः तस्य बान्धवः ।

यस्यार्थाः स पुमांल्लोके यस्यार्थाः सच जीवति ॥

जिसके पास धन है, उसी के मित्र हैं । जिसके पास धन है, उसी के भाई हैं । जिसके पास धन है, वही पुरूष (पुरूषार्थी) है और जिसके पास धन है, वही जीवित है । धन के अभाव में जीवन अभावग्रस्त व कुंठाग्रस्त हो जाता है । कहा भी गया है – 

‘यस्य गेहे टका नास्ति हा टका टकटकायते ।’ अतः धन को संचय करने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि धन के साथ छोड़ देने पर भाई, बन्धु, इष्ट – मित्र, स्व​जन – परिजन सभी साथ छोड़ कर चले जाते हैं । धनहीन​ व्यक्ति से कोई बात तक करना पसन्द नहीं करता । 

लक्ष्मी रूठ​ने के कारण: कभी-कभी पूर्व​जन्म के पाप स्वरूप जन्म कुंडली में दुष्ट ग्रहों के योग से पर्याप्त श्रम – सामर्थ्य करने पर भी अभीष्ट धन की प्राप्ति नहीं हो पाती है । जीवन अभाव ग्रस्त हो जाता है । अतः जिन कारणों से लक्ष्मी जी प्रसन्न हो जाती है, सर्वप्रथम उन्हें दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए । इसके उपरान्त ऐसी परिस्थितियों से त्राण के लिए और अभिष्ट​ धन की प्राप्ति के लिए हमारे ऋषिवरों ने जो उपाय बताये हैं, उनका यथा सम्भव उप​योग करने से अपनी श्री सम्पन्नता में वृद्धि कर सकते हैं ।

मंगलवार को ऋण लेने से लक्ष्मी का रूठना प्रारंभ हो जाता है और बहुत काल तक ऐसा करने से लक्ष्मी पलायित​ हो जाती है । मंगलवार को लिया हुआ ऋण वापस जाने का नाम नहीं लेता और घर में ऋण का स्थायी वास हो जाता है और नये-नये ऋण लेने की स्थितियां पैदा करता रहता है । इसी प्रकार रविवार को जब हस्त नक्षत्र पड़े तब वृद्धि योग और सक्रांन्ति के पुण्यकाल में तथा जब मंगलवार को चतुर्थी, नवमी अथवा चतुर्दशी तिथि पड़े, तब भी ऋण नहीं लेना चाहिए । इस दिन लिया हुआ ऋण उसके कुल में विद्यमान रहता है और लक्ष्मी के रूठ​ने का प्रमुख कारण बनता है । इसी प्रकार बुधवार को किसी को ऋण नहीं देना चाहिए क्योंकि बुधवार को दिया हुआ धन लौटकर नहीं आता है। लक्ष्मी के अभीलाषी पुरुष को कभी द्रोण (दौना पुष्प​), कमल और बिल्व​ को लांघना नहीं चाहिए और न इन्हें पैर से कुचलना चाहिए । केवल नमक और तेल मिलाकर नहीं खाना चाहिए । उत्तर दिशा की ओर मुख करके कभी भोजन नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से व्यक्ति उत्तरोतर​ ऋणी होता चला जाता है और दस​, बीस लाख​ रुपए मासिक​ कमाने पर भी अपना खर्च मेनटेन​ नहीं कर पाता है । उत्तर दिशा की ओर मुख करके भोजन करने से बड़े-बड़े श्रीमन्तों को भी लक्ष्मी के कोप का भाजन बनते हुए देखा गया है ।

इसी प्रकार मकान के ईशान कोण में रसोईघर अथवा शौचालय और सीढ़ियां नहीं बनवानी चाहिए । ईशान कोण की रसोई घर में धन की समस्या हमेशा मुंह बाये खड़ी रहती है । ईशान कोण में सीढ़ियां होने से व्यक्ति दिवालिया हो जाता है । ईशान कोण का शौचालय परिवार में बीमारियों को निमंत्रित करता है । पैसा डॉक्टर के यहां चला जाता है और घर की स्थिति डांवाडोल हो जाती है । ईशान कोण भवन का बहुत पवित्र स्थान है, इसे साफ – सुथरा रखें और दीपक – अगरबत्ती जलायें, इससे घर में आमोद – प्रमोद और प्रसन्नता का वातावरण बनेगा ।

रात्रिकाल में शुद्ध शैय्या पर​ पवित्र अवस्था में शयन​ करें । नग्न होकर जल मे स्नान न करें । केवल​ तेल की बनी हुई वस्तुएं न खायें । मुख पर हल्दी का लेपन न​ करें । बेकार में भूमि पर न लिखें (रेखाएं न खींचें) । मैले – कुचैले वस्त्र न धारण करें । कुत्सित (बासी, विकृत​, बेकार​) अन्न को न खायें । विष्णु भगवान की निन्दा न करें । इन सब कर्यों से लक्ष्मी जी रूठ जाती है, धन का अभाव हो जाता है और किए गए धनार्थक कार्य सफल नहीं होते । अतः कल्याणकामी पुरुषों को उचित है कि पहले इन सब कमियों को दूर करें और तत्पश्चात लक्ष्मीजी के प्रसन्नार्थ​ किसी विशिष्ट मंत्र का अनुष्ठान करें तो शीघ्र ही आर्थिक​ विसंगतियां दूर होकर, समस्याओं से छुटकारा प्राप्त होगा और जीवन खुशहाल बनेगा । इन​ विसंगतियां के दूर ना होने पर कोई भी उपाय सत्परिणाम देने में सफल नहीं हो पाते हैं ।

लक्ष्मी आगमन के उपाय: लक्ष्मी का आगमन चाहने वाले व्यक्ति को चाहिए कि वह सदैव​ पश्चिम दिशा की ओर मुख करके भोजन करे । जितना ऋण चुकाना हो, मंगलवार को चुकायें । रिक्ता तिथि (चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी) को यदि मंगलवार पडे़ तो उस दिन ऋण चुकाने से छुटकारा मिलता है । घृत युक्त अन्न​ का सेवन तथा दुग्ध और मखाने (कमलगटटा का लावा) से बनी मीठी खीर का सेवन लक्ष्मी के आगमन और उनकी कृपा प्राप्ति में सहायक सिद्ध होता है । शुद्ध, स्वच्छ वस्त्र धारण करना और शुद्ध स्वच्छ शैय्या पर तरुण स्त्री के साथ शय​न करना भी लक्ष्मी के आगमन में सहायक सिद्ध होता है । 

उपरोक्त नियमों का पालन करते हुए निम्नलिखित मंत्र की साधना कमलगट्टे की माला से पीले रंग के कम्ब​ल के आसन पर बैठकर करने से शीघ्र ही भगवती लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है । 

सिद्ध लक्ष्मी मंत्र: लक्ष्मी का यह मंत्र अत्यन्त तीव्र​ प्रभावशाली है । स्थापित श्री यंत्र के समक्ष भी इस​का जप करने से अभीष्ट धन की प्राप्ति होती है । इस साधना में दीपक गाय के घी का जलाना होता है और खोये के मीठे का नैवेघ​ भगवती को अर्पित करना होता है । साधक दिन में फलाहार करे और रात्रि में एक बार भोजन । साधना संबंधी पूर्ण जानकारी के लिए किसी योग्य गुरू से संपर्क करें । 

‘श्री’ यह​ भगवती महालक्ष्मी का सघः सिध्दिप्रद एकक्षर​ मंत्र है ।

विनियोग​ : किसी मंत्र की साधना में उसके ऋषि, छन्द​, देवता, विनियोग न्यास – ध्यान की जानकारी अत्यन्त​ आवश्यक है । बिना इनके ज्ञान के मंत्र साधना की सफलता संदिग्ध​ रहती है । अतः इस मंत्र की साधना के लिए सर्वप्रथम​ निम्नलिखित विनियोग का पाठ करें –

अस्य श्री लक्ष्मी बीजमन्त्रस्य भृगुर्ऋषि निचृदच्छन्दः श्री लक्षमीः देवता शं बीजं ईं शक्तिः रं कीलकं सर्वेष्ट सिध्र्दयर्थे जपे विनियोग​ : ।

इसके उपरान्त न्यास करें और हाथ जोड़कर निम्नलिखित मंत्र पढ़ते हुए माँ भगवती का ध्यान करें- 

कान्त्या कात्र्चनसन्निभां हिमगिरि प्रख्यैशचतुर्भिर्गजैः

हस्तोत्क्षिप्त हिरण्मयामृतघटैरासिच्यमानां श्रियम । 

बिभ्राणां वरमब्जयुग्ममभयं हस्तैः किरिटोज्ज्वलां

क्षौमाबध्द नितम्बबिम्बलसितां वंदेऽरविन्दस्थिताम ॥

इस प्रकार से भगवती का ध्यान करके श्रद्धा पूर्वक पूजन करें और उपरोक्त एकाक्षरी मंत्र का अधिक से अधिक जाप करें । मन्त्र सिद्धि हो जाने के उपरान्त विधि कामनाओं की सिद्धि के लिए अलग से मंत्र का जप करके अनुष्ठान करें । मंत्र सिद्धि के उपरान्त वे सभी कार्य जो इस मंत्र की सीमा में आते हैं, किये जा सकते हैं । इस मंत्र की हवन सामग्री में मधुर प्लुत​ कमल और बिल्व​ फल प्रशस्त माना गया है । 

वक्ष​ – प्रणाम जल में खड़ा होकर इस मंत्र का तीन लाख जप करें । जप के समय भगवती का सूर्यमंडल में ध्यान करते रहे । इस प्रकार से अल्पकाल में ही स्थिर​ लक्ष्मी का साधक​ के घर में वास हो जाता है । भगवान विष्णु के मंदिर के सन्निकट स्थित बिल्व​वृक्ष की जड़ के निकट बैठकर तीन लाख मंत्र का जाप करने से साधक इच्छित​ मात्रा में धन को प्राप्त कर लेता है । अशोक वृक्ष की अग्नि में घृतयुक्त तण्डुलों की आहुतियां प्रदान करने से साधक त्रिलोक्य​ को भी शीघ्र वशीभूत कर लेता है । मदार की अग्नि में तण्डुलों की आहुतियाँ पूर्वोक्त​ विधि से करने से साधक राज्य लक्ष्मी को प्राप्त कर राजपुत्र के समान पृथ्वी पर रहता है । मधुर पलुत​ तण्डुलों की खदिर​ के अग्नि में आहुतियाँ देने से साधक शीघ्र ही राजा को वश​ में कर लेता है और उसके घर लक्ष्मी की महान वृद्धि होती है । बिल्व​ की छाया में रहने से और बिल्व मिश्रित हविष्यान्न का भोजन करने से और बिल्व​ के फल अथवा कम​लों से 2 वर्ष पर्यन्त हवन करने से साधक माहालक्ष्मी का दर्शन अपने नेत्रों से निश्चित रूप से करता है । घृत सिक्त हविष्यान्न​ और घी के साथ पायस का ह​वन करने से साधक श्री की प्राप्ति करता है । लाल कमल को घी मैं डुबोकर आदरपूर्वक एक​ लाख आहुतियाँ प्रदान करने से प्रसन्न हुई माहालक्ष्मी उसके वंश पर्यंत निवास करती है । इस प्रकार से भगवती महालक्ष्मी का यह एकाक्षर मन्त्र अभीष्ट फल प्रदान करने में सक्षम है । आशा है आस्थावान​ जन​ इसका प्रयोग कर अधिक से अधिक लाभ उठायेंगे ।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *