दिवाली में दिए क्यों जलाए जाते हैं

Why lamps are lit on Diwali

दिपावली विशेषतौर पर दीप प्रज्ज्वलन का ही त्यौहार होता है । हमारे घर की स्त्रियां स्वयं तो अपने घर में दीप जलाती ही हैं, साथ ही लोकाचार निभाने हेतु त्यौहार की बधाई आस-पड़ोस अथवा कोई रिश्तेदार के यहां जब देने जाते हैं तो एक थाली में सजाकर कई दीप ले जाती हैं । जिस घर में जाती हैं, वहां एक दीपक बधाई के तौर पर रख देती हैं । 

ज्योतिषी दृष्टि से देखें तो यह पाएंगे कि इस समय सूर्य नारायण जो कि समस्त ब्रह्मांड के राजा हैं और आत्मकारक कहे जाते हैं । वे इस समय अपनी नीच राशि तुला पर गोचर कर रहे होते हैं । सूर्य जब​ नीच राशि पर गोचर करते हैं तो संसार में भी अद्भुत परिवर्तन करने की ताकत वह रखते हैं । शायद हमारे ऋषियों ने यह जाना होगा कि इस समय सूर्य पृथ्वी से अत्यधिक विपरीत परिस्थितियों में होते हैं जबकि पृथ्वी पर रहने वाले लोगों को सूर्य का प्रकाश व उस प्रकाश में निहित शक्तियां विपरीत क्रम में प्राप्त होती हैं इसलिए किसी विशेष प्रकार रूपी अग्नि तत्व की जातकों को आवश्यकता पड़ सक​ती हैं । ऋषियों ने यह भी जान लिया था कि इस समय चंद्र सूर्य से समुचित मात्रा में प्रकाश का ग्रहण नहीं कर पाते होंगे इसलिए भी रात्रि में दीप जलाने की प्रथा प्रारंभ की होगी । कार्तिक मास पूरा का पूरा और उसका प्रत्येक दिन भारतीय परंपरा के अनुसार दीप प्रज्वलन का होता है ।

भारत देश में विशेष तौर पर उत्तरी भारत में कार्तिक स्नान की परंपरा अत्यधिक व्याप्त है । इस मास में सूर्य उदय से चार घड़ी पूर्व शय्य त्याग का विधान है । स्त्री व पुरुष दोनों ही, विशेष रूप से स्त्रियां इस मास में सूर्य उदय से पूर्व स्नान करती हैं और कार्तिक मास महात्म्य का श्रवण करती हैं। उस पुराण का महत्व बहुत​ है । उसकी कथाऔं में प्रत्येक दिन किसी न किसी रूप में भोर से पूर्व व सांझ होने के समय दीपक जलाने का महत्व है और इन पौराणिक कथाओं से भाव – विभोर होकर के पूरी श्रद्धा के साथ सद्गृहस्थों की गृहणियां दीप प्रज्ज्वलित​ करती हैं । कई पूरे महीने में अपने शहर के सभी मंदिरों में, तालाबों में, पुराने पवित्र वृक्षों के समीप, चौराहे आदि पर​ एवं पूरे गांव की परिक्रमा भी लगाकर पवित्र स्थानों पर दीप जलाती हैं । दीपावली को अत्यधिक मात्रा में दीपक जलाने का आवश्यकता इसलिए रही की यह​ अमावस्या की रात्रि होती है जो घोर अंधकार से प्राप्त व्याप्त होती है ।

चंद्र दर्शन के अभाव से भी यह​ और अंधियारी हो जाती हैं । एक तो पूरे में मास​ ही सूर्य​ नीच राशि में होने के कारण प्रकाश की विशेष कमी होना, उसमें यदि अमावस्या तिथि हो तो प्रकाश की कमी की कल्पना की जा सकती हैं । ऐसे में प्रकृति से संतुलन​ बनाए रखने के लिए विशेष प्रकार शक्ति प्राप्त​ करने हेतु अत्यधिक मात्रा में दीप जलाए जाते हैं । शायद दीपावली के इस पर्व को मनाने व इसमे अत्यधिक दीप जलाने, रोशनी करने, फुलझड़ी, पटाखे जलाने के पीछे रहस्य​ यही रहा होगा । भारतीय मान्यताओं के अनुसार दीपावली को लेकर विविध​ प्रकार की कथाओं का उल्लेख शास्त्रों में मिलता है लेकिन उक्त​ प्रमाण​ भी इस पर्व की प्रारम्भिक अवस्थाऔं को लेकर सिद्ध प्रतीत होता है । इसलिए प्रज्ज्वलन को मात्र एक परम्परा या रूढी़ मानकर के नहीं औषधीय​ रूप में भी लेना चाहिए अपने – अपने परिवार व इस​ जगत के कल्याण व सुख –  समृद्धि हेतु अवश्यमेव पूरी श्रद्धा के साथ इस​ त्यौहार को सविधि मनाकर दीप प्रज्ज्वलन करना चाहिए । 

दीपावली के दिन दीप प्रज्ज्वलन का सर्वश्रेष्ठ समय सायं सूर्यास्त के पश्चात होता है जबकि प्रदोषकाल होता है । प्रदोषकाल के साथ​ – साथ​ स्थिर लग्न​ व चतुर्घटिका मुहूर्त भी शुद्ध हो तो सर्वश्रेष्ठ होता है । गृहस्थ में गृहलक्ष्मी का पूजन करने हेतु प्रदोषकाल व शुभ, लाभ, अमृत की चतुर्घटिका मुहूर्त सब प्राप्त हो उसी समय सर्वप्रथम दीप प्रज्ज्वलन करके ही पराशक्ति श्री महालक्ष्मी की पूजा प्रारम्भ​ करनी चाहिए । इस प्रकार से पूजा करने से परिवार में सुख-समृद्धि आती है, परिवार की वृद्धि होती है, धन-धान्य की वृद्धि होती है, परिवार में सुख – शांति आती है । कहा जाता है कि घर की प्रधान सौभाग्यशाली सुहागिनी जो स्त्री होती है वह दीपावली की अर्ध्द​रात्रि में अपने घर की झाड़ू लगावें, आंगन की झाडू लगावें और अर्ध्द​रात्रि होने से कुछ​ पूर्व ही घर के सारे कचरे को बाहर भवन से नैर्ऋत्य​ में डाल दें । पश्चत घर के प्रधान आंगन​ में हो सके तो गाय का गोबर लेकर उसको वर्गाकार लीपें ।  उस पर आटा, हल्दी, गुलाल​ आदि के द्वारा रंगोली बनाएं और एक बडा दीपक प्रज्ज्वलित​ करें । जिस घर में यह​ दीपक जलता है उस घर में महालक्ष्मी नारायण भगवान के साथ​ गरुड़ पर बैठकर श्री गणेश जी अर्थात सदबुध्दि के साथ एवं महा सरस्वती रूपी श्रेष्ठ वाणी एवं महाकाली रूपी आलस्य​ नाशिनी शक्ति के रूप में घर​ में प्रवेश करती हैं और परिवार को समृद्ध करती हैं । अलक्ष्मी के दोष का निवारण व शुभलक्ष्मी की प्राप्ति और उस प्राप्ति की चिरकाल तक​ स्थापना घर में अथवा व्यापार में करने के लिए निश्चित रूप से पूरी श्रद्धा के साथ दीपावली पर्व को दीप प्रज्ज्वलनोत्सव​ के रूप में मनाएं और सुख समृद्धि पाएं ।

“राम नाम मनिदीप धरू जीह देहरीं द्वार​ ।

तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजियार ॥”

( Ram Naam Manideep Dhru Jih Dehriyan Dwar

tulasee bheetar baaherahun jaun chaahasi ujiyaar )

हमें अपनी अज्ञानता, अबोधता, योग्यता तथा दुर्बलता को देखकर कभी भी निराश​ नहीं होना चाहिए । इस कार्य में दयामय​ भगवान हमारा सदा सहयोग करते हैं, भगवान ने कहा भी है-

“तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । 

नाशयाम्यत्मभावस्यो ज्ञान दीपेन भास्वता ॥”

(“teshaamevaanukampaarthamahamagyaanajan tamah

naashayaamyatmabhaavasyo gyaan deepen bhaasvata .”)

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहाते है कि- ‘ हे अर्जुन ! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए उनके अंतः करण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित​ अंधकार को प्रकाशमय​  तत्वज्ञान रूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूं ।

कुछ श्लोक व स्त्रोत यहां हम यहां लिख रहे हैं जिनकी दीपावली की रात्रि में पाठ करने एवं ठीक मध्यरात्रि में अपने पूरे घर की झाड़ू निकाल कर, घर के आंगन में दीपक जलाकर पुनः पाठ करते रहने से घर में सुख समृद्धि अक्षय​ रुप में, शुद्ध रूप से प्राप्त होती है । पति-पत्नी दोनों ही करें तो अति लाभकारी ।

  1. गोपाल सहस्त्रनाम का यथोचित संख्या में पाठ ।
  2. लक्ष्मी सहस्त्रनाम की आवृत्तियां ।
  3. श्री सूक्त व पुरुष सूक्त की संयुक्त आवृत्तियां ।
  4. महालक्ष्मी जी का श्री विष्णु सहित​ दुग्धाभिषेक​ ।
  5. निम्न​ श्लोकों व मंत्रों का अधिक से संख्या में जप
  1. (i) “ ऊँ श्रीं ही श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ही श्रीं ऊँ महालक्ष्मयै नमः ।”

(ii) “ दुर्गेस्मृता हरसि भीतिमशेष जन्तो

       स्वस्थै स्मृता मतीमतीव शुभां ददासि ।

       दारिद्रय दुःख भय हारिणी कात्वदन्या,

       सर्वेपकारकरणाय सदार्द्र चित्ता ॥ 

(iii) “ ऊँ महादेव्यै च विदमहे विष्णु पत्निं च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात ॥”

  1. कनक धारा स्तोत्र की आवृत्तियाँ ।

“ध्यान रहे – संख्या पर ध्यान ना देकर यदि शुध्दता वा एकाग्रता से पाठ या जाप किए जाएंगे तो अति लाभ मिलेग​।”

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