दीपावली लक्ष्मी पूजन करते समय जरूर रखें इन बातों का ध्यान

Lakshmi poojan k samay in baaton ka raken dhyaan

देहि सौभाग्यमारोग्यं, देहि में परमं सुखम ।

रूपं देहि जयं देहि, यशो देहि द्वषो जही ॥

(dehi saubhaagyamaarogyan, dehi mein paraman sukham.

roopan dehi jayan dehi, yasho dehi dvasho jahee .)

दीपावली लक्ष्मी पूजन का पर्व है और धन – ऐश्वर्य व वैभव से इसका संबंध है । हम परमात्मा की जिस शक्ति की कृपा से सुख – ऐश्वर्य भोग पा रहे हैं, उस महाराध्या शक्ति को शत-शत नमन । 

“हेतु समस्त जगतां त्रिगुणापिदोषै – 

र्न ज्ञायसे हरिहरादिभिरप्यपारा

सर्वाश्रयाऽखिलमिदं जगदंशभूत​,

मव्याकृता हि परमा प्रकृतिस्वमाघा ॥”

( hetu samast jagataan trigun pidoshai –

rnayanayase hariharaadibhirapyaara

sarvashrayaakhilamidan jagadansheen

, mavikrta hi parama prakrtisvamaagh )

किसी भी परिवार का वैभव​ दीपावली पर्व पर​ ही उजागर होता है । प्राचीन काल से आज पर्यंत दीपावली के दिन प्रदोष काल में अपनी समस्त संपत्ति को देव प्रसाद मानते हुए पूजन करके धर्म आचरण पूर्वक उपयोग में लेने की परंपरा रही है । 

दीपावली देवी लक्ष्मी का जन्मोत्सव है । दीपावली को और अन्य दिनों में भी कभी अकेली लक्ष्मी की आराधना व्यवहारिक रूप से शुभ नहीं होती । जैसा कि पूर्व में भी आया है कि – शक्ति अनियंत्रित हो जाए तो विध्वंसक हो जाती है इसीलिए केवल धन ही आता रहे तो मतिभ्रष्ट हो जाती है, विकार आ जाते हैं ।

कई लोग कहते हैं कि – दीपावली तो लक्ष्मीजी का जन्म दिवस​ है और लक्ष्मी जी की पूजा करनी चाहिए । अन्य देवताओं की पूजा क्यों की जाती है ? यह​ कोई नया प्रश्न नहीं है । प्राचीन काल में मुनियों में ब्रह्मपुत्र सनत्कुमारों से भी यही प्रश्न किया तो उन्होंने बताया कि दीपावली वास्तव में लक्ष्मी सहित अन्य देवताओं के शयन​ का पर्व है जो अपने घर में जितनी सुंदर व्यवस्था करता है, लक्ष्मी सहित अन्य देवगण​, उसके घर में रहकर, उसके परिवार में सुख – समृद्धि बढ़ाते हैं । संतकुमार ने यह भी कहा कि – राजा बलि जब​ अत्यंत शक्तिशाली हो गया और​ उसका प्रताप समस्त लोकों में फैल गया और उसने समस्त देवताओं को अपने अधीन कर बंदी बना लिया था । उसके कारागार​ में लक्ष्मी सहित सभी देवता बंदी थे । तब देवताओं की प्रार्थना पर वामन द्वादशी को वामन अवतार के रूप में जन्म लिया तथा कार्तिक कृष्ण अमावस्या को भगवान वामन ने बलि को अपने अधीन कर लिया । बलि के बंध​ जाने से देवी लक्ष्मी सहित सभी देवगण बंधनमुक्त हो गए, तब सभी देवताओं ने और लक्ष्मीजी ने क्षीर​ सागर में जाकर सुखपूर्वक शयन​ किया । इसीलिए कार्तिक कृष्ण अमावस्या को अपने घर को क्षीर सागर​ के समान स्वच्छ और सुंदर बनाकर देवी लक्ष्मी सहित सभी देवताओं का आवाहन और पूजन कर उनके शयन का अपने घर की सुंदर कक्ष में उत्तम प्रावधान करना चाहिए । जिससे कि वे लक्ष्मी के साथ वहीं निवास करें, कहीं अत्यत्र न जायें । जिस घर में लक्ष्मीजी रहें और देवगण​ भी रहें वहाँ सुख – शांति व समृद्धि की कमी कभी नहीं रहती ।

लक्ष्मीजी व अन्य सभी स्थापित देवताओं के लिए नए वस्त्र, पोशाक, आभूषण, बिछावट​, गददी, आसन आदि नई बनवानी चाहिएं । सभी देवताओं का उत्तम श्रृंगार​ करना चाहिए और सुगंधित पदार्थ छिड़ककर​ व सुगंधित पुष्पों व सामग्रियों से पूजन कर, उनके शयन का सर्वोत्तम प्रबंध​ करना चाहिए । लक्ष्मी पूजन में आसन​, चादर​, गददा आदि भी नये बनवाने चाहिएं । व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर तो वही बांधने के कपड़े, बैठने की गदिदयाँ, तकिए व तकिए की खोली आदि नई बनाई जाती है ।

व्यापारिक प्रतिष्ठानों में वह​ गद्दी जिस पर व्यापारी स्वयं बैठता है उसकी और प्रमुख गल्ला या तिजोरी की सफाई वर्ष​ में केवल एक बार दीपावली के अवसर पर ही होती है । दीपावली के दिन प्रातः काल गद्दी उठकर धुलाई व पाँछा लगाकर सफाई की जाती है, गल्ले, तराजू, बाँट को भीन धोकर​ साफ किया जाता है और फिर शुभ के या लाभ के चौघडिये मे गद्दी बिछाने वाली जगह को धोकर हल्दी कुंकुम से स्वास्तिक लिखकर पंच मांगलिक वस्तु (साबुत हल्दी, मूंग​, धणा, साबुत सुपारी और राई व साबुत​ नमक) स्वास्तिक के ऊपर रखकर कर नई गद्दी बिछाई जाती है । यदि गद्दी एक बार उठाई जाती है तो फिर शुभ मुहूर्त में ही बिछनी चाहिए । इस तरह अपने घर व व्यापारिक​ प्रतिष्ठानों भाली – भाति स्वच्छ कर सभी वस्तुओं की सफाई कर सायंकाल​ मे महालक्ष्मी सहित अन्य देवताओं की पूजन व शयन का प्रबन्ध करन चाहिए । इसलिए दीपावली को रात्रि जागरण करने का भी बड़ा महत्व है । 

दीपावली के दिन तो सभी देवताओं के साथ महालक्ष्मी का पूजन किया जाता है और अन्य दिनों में भगवान श्रिविष्णु के साथ ही लक्ष्मी जी का पूजन करना चाहिए । लक्ष्मी पूजा के लिए लक्ष्मी जी का ऐसा चरित्र रखना चाहिए जिसमें हाथी अपनी सूंड में जल कलश लेकर माहालक्ष्मी का अभिषेक कर रहे हों । सर्वप्रथम दीपक प्रज्ज्वलित कर पूजा का आरंभ होता है । यह दीपक रात​ भर अखण्ड रहे तो सर्वोत्तम होता है । फिर विघ्नविनाशक आदि गणेश का पूजन होता है जिससे किसी प्रकार का विघ्न नहीं आए । फिर षोडश मातृकाओं के रूप में वृध्दि माताओं, कुलदेवता व कुलदेवी का पूजन होता है जिनकी कृपा से वंश और​ व्यापार का विस्तार होता है, फिर सूर्य आदि नवग्रहों का अधिदेव व प्रत्यधिदेव सहित पूजन होता है जिससे कि वे अनुकूल बनी रहे और अनिष्ट नहीं करे बुध्दि भ्रमित नहीं करें । फिर पंच लोकपालों का पूजन होता है जिससे कि प्रकृति भी अनुकूल बनी रहे, फिर प्रधान कलश का पूजन होता है, जिसमें वरूण देव सहित सभी पर्वत​, चतुः वेद​, नक्षत्र​, योग​, करण​, दिकपाल​ आदि सभी का आहवान कर अमृत कलश के रूप में पूजन होता है, पूजा के उपरांत इस​ कलश के के अमृत तुल्य जल​ से घर​ के सभी सदस्यों का अभिषेक होता है, जिससे कि अल्पायु व रोग आदि दूर हो जायें । यहां तक के पूजा विधान तो घर व व्यापारिक प्रतिष्ठानों का समान रूप से होता है । 

घरों मे यहां तक की पूजा करने के बाद हीरे, जवाहरात, रुपए, सिक्के के रूप में महालक्ष्मी देवी का पूजन होता है । देवी लक्ष्मी का पूजन राजोपचार से पूर्ण विधि – विधान से होना चाहिए, फिर घर की तिजोरी में धनाध्यक्ष कुबेर का पूजन होता है, फिर ११ या २१ अथवा अधिक तेल के दीपक जलाकर “ॐ दीपावल्यै नमः” इस नाममंत्र से पूजन किया जाता है और इस प्रकार​ प्रार्थना की जाती है । 

‘त्वं ज्योतिस्त्वं रविश्चन्द्रो विघदग्निश्च तारकाः

सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिदींपावल्यै नमो नमः ॥’

( ‘tvan jyotistvan ravishchandro vighadagnishch taarakaah

sarveshaan jyotishaan jyotideempaavalyai namo namah .’ )

दीपावली का पूजन कर घर के सभी क​क्षों में उनमें से एक – एक दीपक लगा देवें, मुख्य द्वार भी सजा देवें, फिर आरती, पुष्पांजलि व​ क्षमा – याचना कर, भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करें ।

व्यापारिक प्रतिष्ठानों में कलश पूजन के बाद किसी प्रमुख दीवार पर ॐ गणेशाय नमः व​ स्वास्तिक लिखकर देहली विनायक का पूजन करें, जो कि व्यापारिक परिसर के रक्षक देव है, फिर​ व्यापार में उपयोग आने वाले बहोखाते, डायरी, लेजर, रजिस्टर आदि पर स्वास्तिक लिख कर उन पर महा सरस्वती का पूजन करें । पैन या कलम पर​ चित्रगुप्त का और स्याही की दवात पर महाकाली का पूजन करें । गल्ला या तिजोरी में धनाध्य्क्ष कुबेर का पूजन करें, सिंदूर से स्वास्तिक बनाएं । तराजू – बांट पर स्वास्तिक लिखकर​ मोली बांधकर ॐ तुलाधिष्ठातृ देवतायै नमः इस नाम​ मंत्र से पूजा करें । अन्य यंत्रों को भगवान विश्वकर्मा का स्वरूप मानकर​ पूजा करें । फोन या मोबाईल को वायुदेव का स्वरूप मानकर​ पूजा करें, वाहन को महाकाली और देवी दुर्गा पूजा का स्वरूप मानकर​ पूजा करें । फेक्ट्रियों के वाॅयलर, चिमनियों में भी महाकाली व अग्निदेव​ का ही पूजन करें, फिर ११ या २१ दीपक सजाकर​ दीपावली का पूजन करें, फिर देवी लक्ष्मी का पूर्ण विधि-विधान से राजोपचार​ पूजन करें, आरती, पुष्पांजलि व​ क्षमा – याचना करें कि – 

” हे माँ !

अश्वदायि गोदयि धनदायि महाधने ।

पुत्र – पोत्र धनं – धान्यं हस्त्यश्वाश्वतरी रथम ।

प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु मे ॥”

( ” he maan !

ashvadaayi godayi dhanadaayi mahaadhane .

putr – potr dhanan – dhaanyan hastyashvaashvataree ratham .

prajaanaan bhavasi maata aayushmantan karotu me .” )

दीपावली की रात में जागरण करना लाभकारी होता है । व्यापारिक प्रतिष्ठानों में लक्ष्मी सूत्त्क,श्रीसूत्त्क​ या गोपाल सहस्रनाम या कनकधारा स्तोत्र​ के पाठ रात भर​ करवाने के उत्तम​ फल प्राप्त होते हैं । दीपावली की रात में श्रीसूत्त्क​  से ह​वन करना भी लाभकारी होता है । घरों में गोपाल सहस्रनाम​, विष्णु सहस्रनाम, श्रीसूत्त्क​ के पाठ किए जा सकते हैं । रात्रि – जागरण पूर्वक कोई भी पाठ या जाप करने के फल शीघ्र ही प्रकट होते हैं । इस तरह दीपावली पर प्रसन्नचित होकर देवी लक्ष्मी जी की सभी देवताओं के साथ प्रसन्न करें, जिससे कि वे आपके घरों में निवास करें । आप समृध्द होंगे तो राष्ट्र समृध्द होगा, मंदी की आपदा दूर होगी ।

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